पिछले कुछ दिनों से बहुत दूर कहीं जाने का मन कर रहा है, जहां दूर-दूर तक कोई दिखाई ना दे, सिर्फ़ ज़मीन ही ज़मीन या फिर पहाड़ ही पहाड़ और उनके बीच से बहता हुआ झरना, हरिद्वार में गंगा जी का बहता हुआ पानी...बस मन है की .... बैठ के देखता रहूँ पानी को, और सारी थकान मिट जाये, एक घुटं पी लूँ तो बस... सारी प्यास बुझ जाये, मतलब सुकून आ जाये और फिर वहाँ से हृषीकेश चला जाऊँ...मतलब अहह....अहह.... my favourite place...हृषीकेश मैं जब भी जाता हूँ बस खो जाता हूँ, हृषीकेश कुछ ऐसा है, जैसे किसी चित्र को कोई चित्रकार बहुत शिद्दत से अपने कैनवास पर उतारना चाहता है बिलकुल जैसा वो दिखता है... जगह-जगह पर छोटे-छोटे मंदिर, साधु-महात्मा, नदियाँ, पहाड़, शाम की गंगा आरती, राम-झूला, लक्ष्मण-झूला, बस ध्यान में मग्न सब, खोये-खोये से, घंटियों की आवाज़, नदियों में स्नान करते हुए लोग, योग-ध्यान में लीन, गंगा के किनारे बैठे हुए लोग सब अपनी-अपनी दुनिया में खोये हुए... वाक़ई बहुत ही सुंदर बस मन करता है कुछ देर के लिए स्टैच्यू बोल के सब कुछ पॉज़ कर दूँ....और फिर अगर एक चित्रकार को उसकी कल्पना का चित्र उसके सामने दिख जाये ...यकीनन... ख़ुशी का एहसास...ख़ुद पर यक़ीन ना होने का अहसास "की जो चित्र मैं हमेशा से बनाने की सोच रहा था वो कुदरत ने पहले से बना रक्खा है.... हृषीकेश में मैं अपना एक हृषीकेश को देखता हूँ, जो वहाँ से शुरू होता है जहां से एक ढलान पर ऑटो चलता हुआ ब्रिज में प्रवेश करता है और नीचे बहती हुई नदी और सामने ढेर सारे पहाड़ आपका स्वागत करते हैं ....जो सिर्फ़ सुकून देते हैं....चेहरे पर मुस्कान अपने आप आ जाती है जैसे आप घर आ गये हों, पहाड़ एक पिता की तरह होता है, जो आपको अपने अंदर समा लेने की क्षमता रखता है और आपके अंदर के सारे, दर्द, सवाल- जवाब, सबकी हाल ख़बर लेके आपको वापिस आपकी जगह भेज देते हैं..जहां से आप आये थे.... एक नयी ख़ुशी के साथ.....शायद इसलिए आदमी हमेशा पहाड़ की तरफ़ भागना चाहता है...कुछ वक़्त ख़ुद को देने कि लिए.... लेकिन फिर सोचता हूँ की कितनी देर के लिए वो वहाँ जाना चाहता है.... क्या वहाँ जाने से मुझे सब अच्छा लगने लगेगा, अच्छा क्या होता है इस सवाल पर मैं हमेशा अटक जाता हूँ.... मुझे कभी-भी ऊपर का छिछला दिमाग़ पसंद नहीं आता मैं हमेशा गहराई में उतर कर देखना चाहता हूँ....वैसे मैं आजकल बंबई में रहता हूँ....इस शहर की रफ़्तार अलग है कुछ भी धीरे नहीं है सब भाग रहे हैं, लेकिन कहाँ, कहाँ पहुँचना है सबको, वैसे तो मुझे ये शहर बहुत पसंद है, लेकिन मुझे समंदर का किनारा कभी भी पसंद नहीं आता है, मुझे हमेशा समंदर का वो हिस्सा अपनी तरफ़ बहुत आकर्षित करता है जो बहुत दूर दिखता है और लगता है उसके आगे कुछ नहीं है, वहाँ पे सब ख़त्म हो जाएगा लेकिन ये सिर्फ़ मृगतृष्णा है मुझे मालूम है वहाँ पहुँचने पर उससे भी बड़ा समंदर देखने को मिलेगा..... वहाँ पर कुछ तो है जिसको मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता लेकिन वो मुझे हमेशा अपनी तरफ़ खींचता रहता है.....
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